रेकॉर्ड लो लेवल पर आया रुपया, डॉलर के मुकाबले दूसरे देशों की करंसीज की कैसी है हालत

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नई दिल्ली: गुरुवार को रुपये के रेकॉर्ड लो लेवल पर आने के बाद इसकी पड़ताल जरूरी हो गई है कि डॉलर के मुकाबले अन्य देशों की करंसीज की हालत कैसी है? इस की छानबीन करने पर पता चलता है कि दरअसल रुपया कमजोर नहीं हुआ, बल्कि डॉलर ही मजबूत हो रहा है। यही वजह है कि चीन का चालू खाता सरप्लस में होने के बावजूद युआन दबाव में है।

रुपये के लो लेवल का नया रेकॉर्ड

रुपया पहली बार डॉलर के मुकाबले 69 के लेवल से नीचे गिरकर गुरुवार को 69.09 पर चला गया था। इसका पिछला रेकॉर्ड लो लेवल 68.865 का था जो इसने नवंबर 2016 में बनाया था। इस साल अब तक रुपया 8% गिरा है और मैक्रो-इकनॉमिक उथल-पुथल से इस पर दबाव बना रहेगा।

क्या केवल भारत की हालत ऐसी है?

नहीं। दरअसल रुपया नहीं गिरा, डॉलर की कीमत बढ़ गई है। यानी, अधिकतर इमर्जिंग मार्केट करंसीज में अलग-अलग वजहों से गिरावट आई है। चीन के करेंट अकाउंट सरप्लस के बावजूद चाइनीज युआन पर दबाव बना हुआ है। इंडोनेशिया के रुपैया और साउथ अफ्रीका के रैंड की वैल्यू भी घट रही है।

क्यों आई गिरावट?

भारत बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर करता है, इसलिए हमें हर साल ज्यादा से ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। लेकिन विदेशी निवेश में गिरावट आई है, यानी हमारे पास कम डॉलर आ रहे हैं। ऐसे में रुपया का कमजोर पड़ना स्वाभाविक है।

कच्चे तेल के दाम में तेजी और अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी का असर। भारत तेल की अपनी जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात करता है, लिहाजा दाम में बढ़ोतरी होने से उतना ही ऑइल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर लगेंगे।

जिन निवेशकों ने सस्ते रेट पर उधार लिया था, उन्हें अमेरिका में ब्याज दर बढ़ने से भारत में निवेश से मिलनेवाला रिटर्न आकर्षक नहीं लग रहा है। अगर अमेरिका में सरकारी बॉन्ड पर 1.5% के रिटर्न ने 7% रिटर्न पर भारतीय सरकारी बॉन्ड में निवेश को अच्छा बनाया था, तो 3% के अमेरिकी यील्ड ने 8% रिटर्न वाले इंडियन बॉन्ड्स का आकर्षण घटा दिया है। भारत में निवेश करने के लिए उधार लेना भी महंगा सौदा बन गया है।

FII की पिक्चर कैसी है?

फॉरन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FII) से आनेवाले डॉलर ने पिछले तीन वर्षों में रुपये को सहारा दिया था, लेकिन अब वह स्रोत सूखता हुआ दिख रहा है। 2018 में अब तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इंडियन मार्केट्स से 46,197 करोड़ रुपये निकाले हैं।

इकॉनमी के लिए बुरा है कमजोर रुपया?

ऐसा जरूरी नहीं है। 36 देशों के रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) के मुताबिक रुपया अब भी ओवरवैल्यूड है। REER इंफ्लेशन से अजस्टेड करंसी वैल्यू होती है। RBI के डेटा से पता चलता है कि मई तक रुपया 14.67% ओवरवैल्यूड था। कमजोर रुपये से एक्सपोर्ट्स को सहारा मिल सकता है।

EM की आगे की राह

यूरोपियन यूनियन के अपनी असाधारण मॉनेटरी पॉलिसी को खत्म करने और ट्रेड वॉर के खतरे को देखते हुए फाइनैंशल मार्केट में उथल-पुथल और बढ़ने का खतरा है।

तो क्या सब ठीकठाक है?

अपने पास 410 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है जो आपातकाली हालात को संभालने के लिए पर्याप्त से ज्यादा है।
भारत की क्रेडिट रेटिंग भी स्थिर है। इसका मतलब है कि हम अब भी विदेशी निवेशकों की लिस्ट में प्रायॉरिटी पर ही रहेंगे।
हमारे चालू खाता घाटा (आयात पर खर्च और निर्यात से कमाई का अंतर) भी नियंत्रण में है।

तो फिर राजनीति क्यों?

क्योंकि विपक्ष रुपये की कमजोरी को सरकार की असफलता मानता है और सरकार रुपये के भाव बढ़ने को अपनी नीतियों की सफलता के रूप में पेश करती है।

किसने क्या कहा?

‘आदरणीय मोदीजी, आपने डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत की तलुना डॉ. मनमहोन सिंह की उम्र से करके उनका मजाक उड़ाया था। अब डॉलर के मुकाबले रुपया आपकी उम्र को पार करते हुए 68.61 की ऐतिहासिक गिरावट प्राप्त कर चुका है। जैसा कि आपने वादा किया था, रुपया कब डॉलर के मुकाबले 45 पर आएगा।’ – कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला

चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी के ट्वीट्स…

14 जुलाई 2013- जब हम आजाद हुए थे जब 1 रुपया 1 डॉलर के बराबर था। आज कीमतें देखिए….रुपया गिर रहा है।
14 जुलाई 2013- अटल के समय में रुपये की स्थिति क्या थी और अर्थशास्त्री पीएम के अधीन क्या हुआ?
14 नवंबर 2013- रुपया डॉलर के मुकाबले टूट रहा है। कांग्रेस की वजह से रुपया आईसीयू में है।

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