आज के दिन मेरठ से शुरू हुआ था 1857 का विद्रोह आइये जानते है 10 मई 1857 का इतिहास

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1857 के भारतीय विद्रोह को भारतीय विद्रोह, सेप्पी विद्रोह, उत्तर भारत का स्वतंत्रता का पहला युद्ध या स्वतंत्रता के लिए उत्तर भारत का पहला संघर्ष भी कहा जाता है। यह 10 मई 1857 को मेरठ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के सिपाही के विद्रोह के रूप में शुरू हुआ। बंगाल के प्रेसीडेंसी में Sepoys अपने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ विद्रोह किया।

कारण:- 

विद्रोह के कारणों को पिन करना मुश्किल है, और इसके बारे में बहुत तर्क दिया गया है। विद्रोह से पहले, 50,000 ब्रिटिश सैनिक थे, और 300,000 सेपॉय ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में सेवा कर रहे थे।

बलों को तीन प्रेसीडेंसी सेनाओं में विभाजित किया गया था: बॉम्बे, मद्रास और बंगाल। इन सेनाओं का मेक-अप क्षेत्र से क्षेत्र में भिन्न होता है।

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बंगाल सेना ने राजपूतों और भुमहार जैसे उच्च जातियों की भर्ती की। उन्होंने 1855 में निचली जातियों की सूची में कटौती की। इसके विपरीत, मद्रास सेना और बॉम्बे सेना “अधिक स्थानीय, जाति-तटस्थ सेना” थीं, जो “उच्च जाति पुरुषों को पसंद नहीं करते थे”।  बंगाल सेना में उच्च जातियों के प्रभुत्व को प्रारंभिक विद्रोहियों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है जिससे विद्रोह हुआ।

उनकी सेवा की शर्तों में कुछ बदलाव हुए थे जो असंतोष पैदा कर सकते थे। चूंकि ईस्ट इंडिया कंपनी का विस्तार हुआ, सैनिकों को अब बर्मा में कम परिचित क्षेत्रों में सेवा करने की उम्मीद थी, और उन्हें “विदेशी सेवा” पारिश्रमिक के बिना भी करना था। एक और वित्तीय शिकायत सामान्य सेवा अधिनियम से निकली, जिसने सेवानिवृत्त सिपाही को पेंशन से वंचित कर दिया। यह केवल नए भर्ती के लिए लागू होता है, लेकिन पुराने सिपाही ने संदेह किया कि इससे पहले से ही सेवा में उन लोगों पर लागू हो सकता है। इसके अलावा, बंगाल सेना को मद्रास और बॉम्बे सेनाओं से भी कम भुगतान किया गया, जिसने पेंशन पर अपने डर को बढ़ा दिया।

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दिन- 10 मई, 1857:- उस दिन दिल्ली से करीब 60 किलोमीटर दूर मेरठ में अंग्रेजों के खिलाफ पहली जंग लड़ी गई थी। ब्रिटिश सेना में काम करने वाले भारत माता के वीरों ने 50 अंग्रेज सिपाहियों को मार डाला था। ये घटना मेरठ कैंट में हुई थी।
उस विद्रोह की भूमिका काफी दिन पहले से बन रही थी। भारतीय सैनिक नाराज थे गोरों से। नाराजगी की एक वजह ये भी थी कि उन्हें उन कारतूसों को चलाने के लिए कहा जा रहा था जो गाय और सूअर के मांस से बने थे।
इसके चलते हिन्दू-मुसलमान सभी गोरों से बेहद नाराज थे। वे उबल रहे थे। उन्हें कहीं न कहीं लग रहा था कि गोरे जान-बूझकर ये सब कर रहे हैं। इन्हें लगा कि गोरे उनके धर्म को भ्रष्ट कर रहे हैं।

विद्रोही दिल्ली में:-

अगले दिन विद्रोही दिल्ली पहुंचने लगे। इनका नेतृत्व करने के लिए आखिरी मुगल बादशाह बहादुशाह जफर तैयार हो गए। तब तक मुगल सल्तनत अपने अंतिम दिन गिन रही थी। विद्रोह की आग सारे देश में फैलने लगी थी। विद्रोह के चलते गोरी सरकार के हाथ-पैर फूल गए।

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मंगल पांडे को मत भूलो:-

मेरठ में क्रांति का बिगुल बजने से पहले मंगल पांडे बंगाल में शहीद हो चुके थे। पांडे को 29 मार्च,1857 के दिन फांसी पर लटकाया गया था। उनका कसूर था अपने गोरे अफसरों पर हमला बोलना। बहरहाल, 29 अप्रैल,1857 को भारतीय सिपाहियों ने उन कारतूसों का इस्तेमाल करने से मना किया। इस आरोप में 85 को डिसमिस किया गया। इससे भड़क गए थे बाकी भी भारतीय सैनिक। उन्होंने ही 10 मई, 1857 को गोरों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया था।

 

हिन्दू-मुसलमान मिलकर लड़े:- 

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अब मेरठ का चप्पा-चप्पा उस दौर की गवाही देता है। 1857 की क्रांति को आजादी की पहली जंग माना जाता है। सबसे बड़ी बात ये है कि तब गोरों के खिलाफ हिन्दू-मुसलमान मिलकर लड़े थे। उनका नेतृत्व बहादुरशाह जफर ने किया था। उस क्रांति को कभी देश को भूलना नहीं चाहिए।

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10 may 1857
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Atul Bhatnagar
अतुल भटनागर एक निष्पक्ष लेखक है जो देश विदेश में होने वाली सभी घटनाओ पर अपनी नज़र बनाये रखते है और प्राप्त जानकारी को आप तक टॉप न्यूज़ हिंदी के माध्यम से आप तक पहुंचते है इनमे एक अच्छे वक्ता और लेखक का गन होने के साथ साथ ये टॉप न्यूज़ हिंदी के शीर्ष लेखक भी है

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