वो इंडियन बॉलर जिसे वीवीएस लक्ष्मण ने बीच मैदान गालियां दीं

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इंडिया वर्सेज़ ऑस्ट्रेलिया. 2010. मोहाली टेस्ट. इंडिया को जीतने के लिए 216 रन चाहिए थे. स्कोर था 210 रन. आखिरी विकेट. इंडिया की आस थी वीवीएस लक्ष्मण. लक्ष्मण 70 रनों के आस पास बैटिंग कर रहे थे. जीत के लिए मात्र 6 रन चाहिए थे. लक्ष्मण को पीठ में भयानक दर्द था. जिसकी वजह से उन्हें रनर मिला हुआ था. ये वो ज़माना था जब बैट्समैन रनर ले सकते थे. रनर के रूप में आये हुए थे सुरेश रैना. लक्ष्मण स्ट्राइक पर. बॉलिंग पर बेन हिल्फेनहॉज़. रैना स्क्वायर लेग पर क्रीज़ के अन्दर खड़े हुए थे. रन लेने को तैयार. लम्बी गेंद और लक्ष्मण ने बल्ले का फ़ेस बॉल पे मारा. बॉल बॉलर के हाथ के नीचे से निकलकर सीधी बाउंड्री की तरफ़ दौड़ी. लेकिन वहां फील्डर मौजूद था. फिर भी एक रन की पूरी सम्भावना थी. इधर रनिंग एंड पर खड़ा बैट्समैन लक्ष्मण को ही देखे जा रहा था. सब कुछ इतना हड़बड़ी में हो रहा था कि उसे ये याद ही नहीं था कि मैदान पर 15 नहीं 16 लोग थे. रैना सोलहवें थे. नॉन-स्ट्राइकर ने लक्ष्मण को देखा. लक्ष्मण को चूंकि दौड़ना नहीं था, वो शॉट मारकर रुक गए. नॉन-स्ट्राइकर ने लक्ष्मण को रुकते देखा, वो वापस लौट आया. उधर रैना दौड़कर आधी पिच पर आ पहुंचे थे. लक्ष्मण खीज गए. जीत के लिए मात्र 6 रन चाहिए थे और यहां एक रन जो आराम से आ सकता था, रह गया.

आमतौर पर शांत रहने वाले लक्ष्मण चीख पड़े. “ओझा…!!!” और उसके बाद उसे गुस्से में अपना बल्ला उठाकर यूं इशारा किया जैसे भारतीय माएं अपने बच्चों की ओर दूर से ही इशारा करती हैं. गुस्से में लक्ष्मण के मुंह से कुछ गालियां भी निकलीं. लोग हैरान थे. हंसी भी आ रही थी. क्यूंकि लक्ष्मण हमेशा कूल ऐंड कंपोज्ड रहने वाले प्लेयर थे. उनका बल्ला उठाकर मारने का इशारा करना, चीखना, चिल्लाना सब कुछ बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था. हालांकि हम सभी आश्वस्त थे कि दोबारा हमें लक्ष्मण का ये चेहरा नहीं देखने को मिलेगा. 

प्रज्ञान ओझा. वो प्लेयर जिसे लक्ष्मण ने मैदान के बीचों बीच गालियां दी. हालांकि मैच जीतते ही लक्ष्मण ने ओझा को गले से चिपका लिया था. लेकिन ये समझना मुश्किल ही है कि एक ग्यारहवें नम्बर के बैट्समैन के ऊपर क्या बीत रही होगी जब उसे लक्ष्मण बल्ला लेकर मारने का इशारा कर रहा था. ये शायद प्रज्ञान ओझा की ज़िन्दगी का पहला मौका रहा होगा जहां उसे किसी रनर के साथ बैटिंग कर रहे प्लेयर के साथ खेलना पड़ा. और यहीं उनसे चूक हो गयी. ये कोई और मौका होता तो भी जाने दिया जा सकता था. लेकिन यहां बात इंडिया की टेस्ट जीत की थी. रिकी पोंटिंग अभी तक इंडिया में एक भी टेस्ट नहीं जीत पाया था. और लक्ष्मण इस को बरकरार रखना चाहते थे. ओझा को हड़का दिया. विनिंग रन्स ओझा के हिस्से से ही आये. हालांकि उसके बल्ले से नहीं बल्कि पैड्स से. लेग बाई के रन. 19 मिनट में 10 गेंदें खेल 5 रन बनाने वाले प्रज्ञान ओझा को सभी शाबाशी दे रहे थे. लक्ष्मण तो खैर लक्ष्मण थे.

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नवंबर 2013. मुंबई. सचिन तेंदुलकर का आखिरी टेस्ट. और उस टेस्ट में सब कुछ सचिन तेंदुलकर के आखिरी टेस्ट के भार में ही दब गया. पुजारा के 113 रन, रोहित शर्मा के 111 रन और ओझा के 10 विकेट. सब कुछ. मैच तीन दिन में ही ख़तम हो गया था. और इसके पीछे सबसे बड़ी वजह थी ओझा की लेफ़्ट आर्म स्पिन बॉलिंग. पहली इनिंग्स में 40 रन देकर 5 विकेट और दूसरे विकेट में 49 पर 5 विकेट लेने के बाद पिछले 20 सालों में 10 विकेट लेने वाले वो पहले लेफ़्ट-आर्म स्पिनर बने. धोनी को अपने कप्तानी के करियर की नौवीं जीत मिल चुकी थी. लेकिन जश्न मन रहा था तेंदुलकर की विदाई का.

प्रज्ञान ओझा इससे पहले कि इंडियन टीम में आते, वो रणजी में फल-फूल रहे थे. हर कोई इस बात का इंतज़ार कर रहा था कि कब ओझा टीम में दिखेंगे. ओझा को टीम में हिस्सा बहुत बाद में मिला. ऐसा कहा जा रहा था कि उन्हें बहुत पहले ही इंडियन कैप पहनने का मौका मिल जाना चाहिए था. पहला वन-डे मैच बांग्लादेश के खिलाफ़ था. और पहला इंटरनेशनल विकेट एकदम शानदार. रकीबुल हसन क्रीज़ पर थे. लेफ़्ट आर्म से फेंकी गयी गेंद ड्रिफ्ट करती हुई मिडल और लेग स्टंप की लाइन में गिरी. इसके साथ ही जादुई काम किया बॉल के ग्रिप होने ने. आगे चलकर ये ओझा की पहचान भी बन गयी. सर्फेस ग्रिप करने के बाद गेंद स्पिन की और ऑफ स्टंप के टॉप पर जा लगी. विकेट सचमुच जानदार था.

इसके बाद उन्हें टेस्ट टीम में आने में टाइम लगा. इतना नहीं लगना चाहिए था. श्री लंका की टीम इंडिया आई हुई थी. पहले मैच में कुल 4 विकेट लिए. इसी मैच में श्रीसंत ने श्री लंका की पहली इनिंग्स में 5 विकेट लिए. इंडिया ने मैच एक इनिंग्स और 144 रनों से जीता.  प्रज्ञान ओझा की बॉलिंग कामचलाऊ से कहीं बेहतर थी. हर किसी को मालूम था कि ओझा आगे चलकर झमाझम सुधार कर लेंगे.

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टेस्ट टीम में आश्विन के साथ मिलकर उन्होंने अच्छी पार्टनरशिप बनानी शुरू कर दी. इंडियन पिचों पर अश्विन के साथ इनका कॉम्बो बेहतरीन था. लेफ़्ट आर्म और ऑफ स्पिनर की जोड़ी घातक होती ही है. लेकिन यही बात कई बार ओझा के ख़िलाफ़ भी चली जाती है. ओझा को हमेशा ही एक साथी की ज़रुरत रही है. उन्हें बैकअप चाहिए ही होता है. वो भी स्पिनर के रूप में. साथ ही ओझा धूल भरी पिचों के बॉलर लगते हैं. हरयाली भरी पिचों पर गेंद फेंकने में उन्हें उतना मज़ा नहीं आता है जितना भब्भ उड़ाती पिचों पर.

ऐक्शन पर उठे सवालों के बाद मिला बैन ओझा को हिला गया. इसी वक़्त उन्हें साथ मिला सीनियर प्लेयर्स का. स्पेशली लक्ष्मण का. वही लक्ष्मण जिसने उन्हें बल्ला उठाकर दे मारने का इशारा किया था. ओझा और लक्ष्मण के बीच वो बुरी तस्वीर वहीं डब्बे में बंद हो गयी थी. लक्ष्मण ने उन्हें काफ़ी समझाया. परिवार का सपोट मिला और ओझा ने अपने ऐक्शन में सुधार किया. साथ ही उन्हें उनके कोच और फिज़ियो ने भी उनकी मदद की. हैदराबाद से बंगाल की रणजी टीम में स्विच कर ओझा ने कहा कि अब वो मेंटली एक अच्छे स्टेट में हैं. ओझा 100 टेस्ट विकेट लेने वाले भारतीयों में तेज़ी के मामले में तीसरे प्लेयर हैं. सचिन के आखिरी मैच में उनकी परफॉरमेंस उनके क्रिकेट करियर के सबसे अच्छे फ़िगर हैं. लेकिन अफ़सोस यही है कि उसके बारे में कभी ज़्यादा बात नहीं हो पाई. फ़िलहाल ओझा बंगाल की टीम में स्पिन अटैक को मजबूत करने में लगे हैं. आगे इंडियन टीम में उनका क्या स्कोप है, हम सभी को मालूम है. बाकी लक्ष्मण वाला केस तो हमेशा याद ही रहेगा. “ओझा…!!!”

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